क्यों दयानतदारी (ईमानदारी) आपका बेहतरीन ROI है?
हकीकत और आज का दौर: सिस्टम में "चिकनाई" का भ्रम
हिंदुस्तान में हम अक्सर सुनते हैं कि "कोई भी चीज़ थोड़ी सी 'अतिरिक्त सेवा' के बिना नहीं चलती।" चाहे इमारत का परमिट हासिल करना हो, कोई बिज़नेस कॉन्ट्रैक्ट फाइनल करना हो, या किसी स्कूल में एडमिशन— "टी मनी" या "स्पीड मनी" (रिश्वत) का कल्चर हर जगह मौजूद है। हम यह कहकर इसका बचाव करते हैं कि, "सिस्टम ऐसे ही काम करता है," या "मैं तो सिर्फ वही ले रहा हूँ जो मेरा हक़ है।"
लेकिन "स्पीड मनी" असल में एक रूहानी रुकावट है। जब भी हम रिश्वत या भ्रष्टाचार में हिस्सा लेते हैं, तो हम बुनियादी तौर पर यह कह रहे होते हैं कि हमें 'सिस्टम' और 'अफ़सरों' पर ज़्यादा भरोसा है और 'अर-रिज़्क़' (अल्लाह) पर कम। हम हराम ज़रिया इस्तेमाल करके अल्लाह के बनाए रिज़्क़ के निज़ाम को "हैक" करने की कोशिश कर रहे होते हैं।
वही (नुज़ूल): लेने और देने वालों पर लानत
इस्लाम सरकारी या निजी दफ़्तरों की नैतिकता पर कोई समझौता नहीं करता। नबी करीम (स.अ.व.) ने फ़रमाया:
"रिश्वत देने वाले और रिश्वत लेने वाले, दोनों पर अल्लाह की लानत है।" (मुसनद अहमद 6791, सुनन अबू दाऊद 3580, )
अल्लाह सुबहानहु व तआला क़ुरआन में भी फ़रमाता है:
"और आपस में एक-दूसरे का माल नाहक़ (गलत तरीके से) न खाओ और न ही उसे हाकिमों (अफ़सरों) के पास (रिश्वत के तौर पर) भेजो ताकि तुम लोगों के माल में से कुछ हिस्सा गुनाह के साथ खा सको, जबकि तुम जानते हो (कि यह गलत है)।" (सूरह अल-बक़रह, 2:188)
भ्रष्टाचार कोई "बिना पीड़ित वाला अपराध" (Victimless Crime) नहीं है। यह समाज के भरोसे को तबाह कर देता है। यह सुनिश्चित करता है कि अमीर 'कनेक्शन' के ज़रिए अमीर होते जाएँ, जबकि काबिल और गरीब लोग पीछे रह जाएँ।
हिकमत-ए-अमली (प्लानिंग): बाज़ार में अपनी साख बचाना
"सब्र" प्रीमियम: कभी-कभी हलाल तरीके से काम करने में ज़्यादा वक्त लगता है। आप एक परमिट के लिए 6 महीने इंतज़ार कर सकते हैं जो दूसरों को (रिश्वत देकर) 6 दिनों में मिल जाता है। इस इंतज़ार को 'इबादत' समझें। यह "खोया हुआ वक्त" असल में आपकी बरकत में किया गया निवेश है।
अटल छवि (Unbribable Reputation): अपनी साख ऐसी बनाएँ कि लोग जान लें कि आप "रिश्वत न देने वाले" इंसान हैं। वक्त गुज़रने के साथ, लोग आपसे माँगना छोड़ देंगे और आप अपने जैसे ही ईमानदार पार्टनर्स को अपनी तरफ आकर्षित करेंगे। इस तरह आप एक "नैतिक इकोसिस्टम" बनाते हैं।
मज़लूम की दुआ: याद रखें कि रिश्वत के ज़रिए हासिल की गई दौलत अक्सर किसी और का "हक़" मारकर ली जाती है। आप कभी नहीं चाहेंगे कि किसी ऐसे शख्स की आह या बद्दुआ (जिसका हक़ आपने मारा है) आसमान तक पहुँचकर आपके खिलाफ हो जाए।
बरकत ऑडिट (आज के कदम)
सिस्टम स्कैन: क्या आप किसी ऐसे "शॉर्टकट" में शामिल हैं जिसमें ऐसी रकम का लेन-देन हो रहा है जो सरकारी रसीद पर नहीं है?
अमल (Action): अगर आप किसी ओहदे पर हैं (मैनेजर, मालिक या कर्मचारी), तो आज ही यह साफ़ कर दें कि आपका दरवाज़ा "गिफ्ट" या "फेवर्स" के लिए बंद है।
गौर-ओ-फ़िक्र: सूरह बक़रह की आयत 188 पढ़ें और शब्द "नाहक़" की गहराई पर गौर करें।