हमारी पिछली कड़ी में, हमने उन तीन तरह के छात्रों के बारे में जाना जो कॉलेज की फीस के संकट से जूझ रहे हैं। आज, आइए इस उलझन को इस्लामी शरिया (Islamic Law) के नज़रिए से बेहद आसान शब्दों में समझते हैं।
इस्लामी विद्वान (उलेमा) इंसानी ज़रूरतों को मुख्य रूप से दो बड़े हिस्सों में बाँटते हैं:
1. 'ज़रूरह' (Darurah) - जीवन-मरण का संकट 🚨 यह वह स्थिति है जहाँ इंसान की जान पर बन आती है और ज़िंदा रहने के लिए वह चीज़ बेहद ज़रूरी होती है। मिसाल के तौर पर, अगर कोई शख्स किसी रेगिस्तान में भूख से मर रहा हो और वहाँ हराम खाने के अलावा कुछ भी मौजूद न हो, तो इस्लामी शरीयत उसे अपनी जान बचाने भर के लिए वह खाने की इज़ाज़त देती है। क्योंकि इस्लाम में 'जान की हिफाज़त' को पहला स्थान दिया गया है।
2. 'हाजह' (Hajah) - एक बड़ी और गंभीर ज़रूरत 💼 यह वह चीज़ है जो एक इज़्ज़तदार ज़िंदगी जीने और गंभीर तंगी व मज़बूरी से बाहर निकलने के लिए ज़रूरी होती है।
अब अगर हम किसी एक अकेले छात्र के नज़रिए से देखें, तो IIT या किसी मेडिकल कॉलेज की सीट छूट जाने से उसकी जान नहीं चली जाएगी। वह किसी छोटी दुकान पर काम करके या मज़दूरी करके भी ज़िंदा रह सकता है। इसलिए, व्यक्तिगत स्तर पर एक ऊँची कॉलेज डिग्री 'हाजह' (ज़रूरत) के दायरे में आती है, 'ज़रूरह' (जीवन-मरण के संकट) में नहीं।
बड़ा नज़रिया: कौम की ढाल और 'फर्ज़-ए-किफ़ाया'
लेकिन इस्लाम के महान विचारकों और फकीहों (जैसे इमाम इब्न तैमिया रह.) ने एक बहुत ही खूबसूरत और बारीक बात की तरफ़ इशारा किया है। उन्होंने बताया कि अगर किसी सख़्त नियम की वजह से पूरी की पूरी कौम तबाही, घोर गरीबी और अज्ञानता (जहालत) के दलदल में धंस रही हो, तो शरिया के फैसलों का पैमाना व्यापक हो जाता है।
इस्लाम में ऐसे माहिर और प्रोफेशनल लोग तैयार करना जो पूरी कौम की हिफाज़त और सेवा कर सकें, 'फर्ज़-ए-किफ़ाया' (Collective Duty) कहलाता है। यानी अगर समाज में ज़रुरत के मुताबिक डॉक्टर या वकील नहीं होंगे, तो पूरी कौम गुनहगार होगी और मुसीबत में पड़ जाएगी।
इसी आधार पर आज के आधुनिक दौर के बड़े उलेमा का कहना है कि: यदि कोई बेहद होनहार और काबिल छात्र किसी बहुत बड़े और भविष्य बनाने वाले संस्थान (जैसे IIT, NIT, AIIMS या कोई टॉप सरकारी कॉलेज) की परीक्षा पास कर लेता है, और उसके पास फीस भरने का कोई भी दूसरा आर्थिक रास्ता बिल्कुल न बचा हो, तो ऐसी मज़बूरी की हालत में एजुकेशनल लोन लेना एक 'आपातकालीन अपवाद' (Emergency Exception) के तौर पर देखा जा सकता है।
लोन लेने की तीन सख़्त शर्तें (यदि कोई रास्ता न बचे)
अगर कोई छात्र इस मज़बूरी के रास्ते पर जाता है, तो शरीयत ने इस पर कुछ बेहद सख़्त शर्तें लगाई हैं, जिन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता:
दिल में नापसंदगी और तौबा का भाव: आप इसे कोई आम बात मानकर "चिल" नहीं कर सकते। आपके दिल में ब्याज (सूद) के प्रति गहरी नापसंदगी और अल्लाह से माफ़ी का अहसास होना चाहिए।
सिर्फ़ बुनियादी खर्च के लिए लोन: आप किसी आलीशान रूम, महंगे गैजेट्स या ऐश-ओ-आराम की ज़िंदगी के लिए एक्स्ट्रा पैसा लोन नहीं ले सकते। लोन की रकम सिर्फ़ उतनी ही होनी चाहिए जितनी कॉलेज की फीस के लिए अनिवार्य है।
आग की तरह जल्द से जल्द चुकाना: नौकरी लगते ही आपकी पहली सैलरी से आपकी सबसे बड़ी प्राथमिकता उस बैंक के कर्ज़ को तुरंत चुकाना होना चाहिए, ताकि आप जितनी जल्दी हो सके सूद के इस जाल से बाहर निकल सकें।
लेकिन ठहरिए! इससे पहले कि कोई भी छात्र किसी कमर्शियल बैंक का दरवाज़ा खटखटाने के बारे में सोचे, हमें यह जानना होगा कि भारत में इसके अलावा भी कई बेहतरीन और पाक रास्ते मौजूद हैं। हमारी कौम के पास विकल्पों का एक बड़ा खज़ाना है। आइए, अगली कड़ी में उन सीधे रास्तों पर बात करते हैं।