"अब्बा, हम कॉलेज की फीस कैसे भरेंगे?"
यह एक ऐसा सवाल है जो आज लाखों भारतीय मुस्लिम घरों में गूँज रहा है। जब हमारे होनहार युवा अपनी 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं में कामयाब होते हैं, तो IIT, IIM या किसी बड़े मेडिकल कॉलेज में सीट हासिल करने का उनका ख़्वाब अक्सर एक गहरे माली (आर्थिक) ख़ौफ़ में बदल जाता है। प्रोफेशनल डिग्रियों—चाहे वह B.Tech हो, MBA हो या MBBS हो—की आसमान छूती लागत ने उच्च शिक्षा को एक ऐसे पहाड़ में तब्दील कर दिया है, जिस पर बिना किसी बाहरी मदद के चढ़ना हमारे मेहनतकश और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए नामुमकिन सा हो गया है।
दीन और दुनिया की कशमकश
उच्च शिक्षा का यह आर्थिक संकट दुनिया भर के मुस्लिम युवाओं की एक गहरी परेशानी बन चुका है। यह छात्रों को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देता है जहाँ उन्हें माली तरक्क़ी (आर्थिक प्रगति) और रूहानी समझौते (आध्यात्मिक समझौते) में से किसी एक को चुनना पड़ता है।
पश्चिमी देशों में, जैसे कि ब्रिटेन (UK) के यूनिवर्सिटी फीस सिस्टम में, इस संकट को अक्सर इस्लामी फ़िक़्ह (Jurisprudence) के नज़रिए से देखा जाता है। वहाँ के उलेमा (विद्वान) 'ज़रूरह' (अस्तित्व के लिए बेहद ज़रूरी) और 'हाजह' (सामूहिक या व्यक्तिगत ज़रूरत) के सिद्धांतों के तहत सूद (ब्याज) की मनाही पर बहस करते हैं।
भारत की ज़मीनी हक़ीक़त और 'रिबा' (सूद) का जाल
लेकिन जब हम इस बहस को भारत के माहौल में देखते हैं, तो यहाँ की कानूनी और आर्थिक हकीकतें पूरी तरह बदल जाती हैं। भारत में सरकार की तरफ से ऐसी कोई एक समान व्यवस्था नहीं है जो छात्र की भविष्य की आमदनी के हिसाब से बिना ब्याज का लोन दे। नतीजा यह है कि भारतीय कमर्शियल बैंकों से मिलने वाले एजुकेशनल लोन पूरी तरह से सूद पर आधारित होते हैं।
एक बाअमल (अमल करने वाले) मुसलमान के लिए इन कागज़ात पर दस्तख़त करना सिर्फ एक सामान्य लेन-देन नहीं है, बल्कि यह ईमान का एक बड़ा इम्तिहान है। अल्लाह तआला कुरान में 'रिबा' (सूद) को सख़्ती से मना फरमाता है। ऐसे में परिवार एक भयानक उलझन में फँस जाते हैं:
क्या हम अपने ईमान की हिफाज़त के लिए उच्च शिक्षा को क़ुर्बान कर दें, या मजबूरन आर्थिक तंगी की वजह से अपने ईमान से समझौता कर लें?
हमारे समाज की तीन कड़वी तस्वीरें
जब इस कड़वी हकीकत का सामना होता है, तो भारतीय मुस्लिम छात्र आमतौर पर तीन अलग-अलग श्रेणियों में बँट जाते हैं:
बचने वाले (अजतिनाब करने वाले): ये वे लोग हैं जो सूद से दूर रहने के लिए या तो उच्च शिक्षा पूरी तरह छोड़ देते हैं, या फिर ऐसे छोटे कोर्सेज चुनते हैं जिनमें आगे बढ़ने के मौके बहुत कम होते हैं।
परेशान हाल: ये वे लोग हैं जो कोई दूसरा रास्ता न पाकर बेहद मायूसी और भारी दिल के साथ कमर्शियल बैंक से लोन ले लेते हैं। उनके दिलों पर हमेशा एक रूहानी बोझ और गुनाह का गहरा अहसास रहता है।
लापरवाह (लाताल्लुक): ये वे लोग हैं जो सूद को "आधुनिक जीवन का एक सामान्य हिस्सा" मानकर बिना किसी झिझक के बैंक लोन ले लेते हैं। उन्हें सूद के ख़िलाफ़ शरीयत की चेतावनियों की कोई परवाह नहीं होती।
हमारा रास्ता क्या होना चाहिए?
एक उम्मत (कम्युनिटी) के तौर पर, हमें इस 'लापरवाह' रवैये को पूरी तरह ख़ारिज करना होगा—क्योंकि अल्लाह के अहकाम को कभी भी हल्का नहीं लिया जा सकता। लेकिन इसके साथ ही, 'बचने वालों' का रास्ता—यानी सूद के डर से अच्छी और प्रोफेशनल तालीम को पूरी तरह छोड़ देना—भारत में मुस्लिमों के मुस्तकबिल (भविष्य) के लिए एक बड़ा नुकसान है। हमें अपनी कौम को शैक्षिक रूप से पीछे नहीं धकेलना है।
आगे बढ़ने के लिए हमें मायूसी या गुनाह के अहसास में डूबे रहने के बजाय एक व्यावहारिक और हकीकत पसंद रास्ता तलाशना होगा। हमें इस संकट को इस्लामी उसूलों और भारत के स्थानीय विकल्पों, दोनों को सामने रखकर देखना होगा।
इस सीरीज़ में आप क्या जानेंगे?
इस पाँच भागों की लेख श्रृंखला (Series) में, हम इस बड़ी उलझन को आसान और व्यावहारिक समाधानों में बदलेंगे:
हम जायज़ा लेंगे कि इस्लामी इतिहास हमें आर्थिक संकटों से निपटना कैसे सिखाता है।
हम विश्लेषण करेंगे कि आधुनिक भारतीय बैंकिंग सिस्टम वास्तव में कैसे काम करता है।
सबसे अहम बात: हम आपको मुफ्त सरकारी स्कॉलरशिप (Government Scholarships), कॉर्पोरेट फंड्स, और कम्युनिटी की मदद से चलने वाले बिना ब्याज के लोन (Alternative Financing) का एक पूरा रोडमैप देंगे।