दुनिया और आख़िरत का बेहतरीन संतुलन
हकीकत और आज का दौर: "वर्क-लाइफ़" बनाम "लाइफ़-आफ्टर-लाइफ़"
हैदराबाद या दिल्ली जैसे शहरों की मसरूफ ज़िंदगी में हम "Work-Life Balance" की बहुत बातें करते हैं। हम अपने 9 से 5 के वक्त को मैनेज करना चाहते हैं ताकि परिवार के लिए वक्त निकाल सकें। लेकिन एक मुसलमान के लिए 'मीज़ान' (तराजु) बहुत बड़ा है। यह सिर्फ काम और घर का नहीं, बल्कि "दुनिया और आख़िरत" का संतुलन है।
हम अक्सर इन्हें दो अलग अकाउंट समझते हैं। हमारी एक "प्रोफेशनल लाइफ" होती है (जहाँ हम डेटा और टारगेट के पीछे भागते हैं) और एक "धार्मिक लाइफ" (जहाँ हम दुआ और थोड़ा सदक़ा देते हैं)। लेकिन क़ुरआनी जीवनशैली इन दोनों को अलग करने के बारे में नहीं, बल्कि इन्हें आपस में जोड़ने के बारे में है। आपका करियर ही आपका जन्नत का रास्ता बन सकता है, बशर्ते आपकी नीयत और तरीके सही हों।
वही (नुज़ूल): मुतवाज़िन (Balanced) मोमिन की दुआ
क़ुरआन में सबसे ज़्यादा पढ़ी जाने वाली दुआ "गरीबी" या "दुनिया को छोड़ देने" की दुआ नहीं है। यह दोनों जहाँ में कमाल हासिल करने की दुआ है:
"ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भी भलाई (हसना) अता फरमा और आख़िरत में भी भलाई अता फरमा और हमें आग के अज़ाब से बचा।" (सूरह अल-बक़रह, 2:201)
अल्लाह उन लोगों की तारीफ करता है जो इस ज़िंदगी में भी "हसना" (उत्कृष्टता/नेकी) की तलाश करते हैं। वह नहीं चाहता कि आप एक 'नाकाम' प्रोफेशनल बनें। वह चाहता है कि आप सबसे ईमानदार, सबसे हुनरमंद और सबसे कामयाब इंसान बनें, ताकि आपकी कामयाबी नेक कामों के लिए एक "प्लेटफ़ॉर्म" बन सके।
इस संतुलन को समझने के लिए रसूल अल्लाह (स.अ.व.) की यह हदीस सबसे सटीक है:
"कितने ही दुनिया के काम ऐसे हैं जो (अच्छी) नीयत की वजह से आख़िरत के काम बन जाते हैं, और कितने ही आख़िरत के (दिखने वाले) काम ऐसे हैं जो (बुरी) नीयत की वजह से दुनिया के काम (महज़ दिखावा) बन जाते हैं।" (सहीह मुस्लिम, 1907)
हिकमत-ए-अमली (प्लानिंग): "इंटीग्रेटेड प्रोफेशन"
नीयत बतौर "ट्रांसफार्मर": अगर आप अपने परिवार की परवरिश और लोगों के आगे हाथ न फैलाने की नीयत से सख़्त मेहनत करते हैं, तो आपके दफ़्तर के 8 घंटे इबादत के तौर पर लिखे जाते हैं। आपको एक ही वक्त में दोनों 'करेंसी' (दुनियावी पैसा और आख़िरत का सवाब) मिल रही हैं।
दफ़्तर में आपकी नैतिकता (Ethics) हज़ारों भाषणों से बड़ी 'दावत' है। जब लोग एक मुस्लिम प्रोफेशनल को वक्त का पाबंद, ईमानदार और मेहरबान देखते हैं, तो वे क़ुरआन को अमल में देख रहे होते हैं।
सस्ते सौदे से बचें: अगर करियर का कोई कदम आपको दुनिया तो दे रहा है लेकिन उसकी कीमत आपकी आख़िरत है (जैसे जुमे की नमाज़ का छूटना, या सूद/ब्याज का काम करना), तो यह घाटे का सौदा है। एक अक्लमंद निवेशक हमेशा "लॉन्ग-टर्म" एसेट (आख़िरत) को तरजीह देता है।
बरकत ऑडिट (आज के कदम)
इंटीग्रेटेड चेक: क्या आप ईमानदारी से कह सकते हैं कि आपका करियर आपको अल्लाह के करीब होने में मदद दे रहा है? अगर नहीं, तो नीयत या काम के तरीके में बदलाव की ज़रूरत है।
अमल (Action): कल से काम शुरू करने से पहले कहें: "ऐ अल्लाह! मैं यह काम अपने घरवालों की कफ़ालत और तेरी मख्लूक की खिदमत के लिए कर रहा हूँ, इसे मेरी इबादत समझकर कुबूल फरमा।"
ज़िक्र: हर नमाज़ के बाद "रब्बना आतिना..." का विर्द करें और जानबूझकर उस 'भलाई' के बारे में सोचें जिसे आप अपने काम के ज़रिए फैलाना चाहते हैं।